मानव का एक जिज्ञासु प्राणी होने के कारण, सभ्यता के शुरुआती दिनों से ही वह अपने चारो ओर जिस भी चीज को देखता उसके बारे में जानने की भरपूर प्रयत्न अवश्य ही करता रहा है। जैसे-जैसे समाज का निर्माण, वर्ण व्यवस्था (जिसे आज समाज के लोग जाती व्यवस्था समझने की भूल कर रहे हैं ) इत्यादि व्यवस्थाओं का निर्माण हुआ। लोगों के मन में इस बात की भी जिज्ञासा जागने लगी की हमारे जाती का समाज में क्या स्थान है तथा उसकी आबादी कितनी है, इन्हीं जिज्ञासाओं के फलस्वरूप जातीय जनगणना जैसी व्यवस्था का उद्गम हुआ।

उद्गम
जातीय जनगणना कि शुरुआत कब हुई, इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ भी कहना संभव नहीं हैं।
जातीय जनगणना की शुरुआत
अंग्रेजों ने अपने १८८१ – १९३१ के शाषण के दौरान जनगणना करवाई तथा इसमें जाती की जानकारी ली। आजादी के बाद पुनः जातिगत विभाजन तथा जाती से उत्पन होने वाली अन्य कुरूतियों के कारण १९५१ में जनगणना के दौरान जातियों के आकड़े लेना बंद कर दिया गया।
जरुरत क्यों
आजादी के लगभग ८० वर्ष पूर्ण होने के बाबजूद भी समाज के बहुत से ऐसे वर्ग जो आज भी सरकार के द्वारा लागु किये गए अथवा सरकार द्वारा चलाये गए पिछड़ा वर्गों के उत्थान के व्यवस्थाओं से वंचित हैं, उन्हें समाज के साथ जोड़ना तथा उनको भी एक अच्छा और सुयोग्य जीवन जीने योग्य रास्तों पर लाना, यही सरकार का मुख्य लक्ष्य है। इस बार के जातिगत जनगणना की आवश्यकता क्यों पड़ी, इसके बारे में बताते हुए केंद्रीय सुचना एवं प्रसारण मंत्री Ashvani Vaishnav ने कहा की कुछ राज्यों ने जातिगत जनगणना करवाई है, लेकिन उसके आकड़े पारदर्शी नहीं हैं। जिसके कारण समाज में जाती आधिरत संदेह उतपन्न हो रहा है, जो की देशहित में नहीं हैं।
पिछली जनगणना में क्या हुआ
केंद्र में UPA के सरकार के दौरान २०११ में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने सामाजिक, आर्थिक सर्वे किया। लेकिन २०१३ तक data process नहीं हो पाया । २०१४ में जब BJP की सरकार आयी, तब data जारी हुआ, लेकिन इसमें जाती का data जारी नहीं हुआ। सरकार ने २०२१ में कहा की जातिगत data इसलिए जारी नहीं किया गया, क्योंकि इसमें कुछ technical error था ।
जनगणना कराने का अधिकार
जनगणना कराना केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं। इस समय देश में भारत – पाकिस्तान के बीच आक्रोश के माहौल में जातिगत जनगणना कराने का ऐलान कर केंद्र सरकार पुरे देश को अपने पूर्व में लिए गए कई निर्णयों की तरह एक बार फिर से चौका दिया।
इस बार होने वाले जनगणना के अहम बिंदु
- पिछले जनगणना के कर्मचारी जातीय जनगणना करने में दक्ष नहीं थे। इसबार सरकार जनगणनाकर्मियों को इसके लिए विशेष training दे सकती है।
- पिछले जनगणना में जनगणनाकर्मियों के पास जातियों की सूची नहीं थी। सभी लोग अपने विवेक के आधार पर अपनी जाती दर्ज करवा सकते थे। जातियों की सूचि होने के कारण इसबार जनगणनाकर्मियों को जाती दर्ज करने में सहूलियत होगी तथा आगे होने वाले data processing में भी सहूलियत होगी।
- पिछली जनगणना किसी Act के अंतर्गत नहीं हुई थी। जबकि इसबार की जनगणना Parliament Act के अंतर्गत होगी।
- पिछले जनगणना में हिस्सा लेना तथा अपनी जाती बताना Optional था, जबकि इसबार जनगणना के समय जनगणनाकर्मियों द्वारा जाती पूछे जाने पर बताना अनिवार्य होगा।
- इसबार के जनगणना को जल्द से जल्द पूरा किया जाएगा, और इसका data २०२६ अंत या २०२७ के first quarter में मिलने की संभावना रहेगी।
सारांश
देश में जातिगत जनगणना की आवश्यकता अहम् हैं, क्योंकि उसी के आधार पर सरकार पिछड़ा वर्ग उन्मूलन कार्यक्रमों को सुनिश्चित रूप से चला सकती है। इससे राजनितिक दलों के बीच में भी जातियों को लेकर जो भ्रांतियाँ फैली हुई है, वह दूर हो जाएगी, और वो भी समाज के सभी वर्गों के लिए उचित कार्यो को बिना किसी भ्रान्ति के कर पाएंगे ।


टिप्पणी करे